The Song of Resistence : जब समाज में ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी और दमन अपने चरम पर हों, तब साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह जाता, बल्कि प्रतिरोध की आवाज़ बन जाता है। प्रस्तुत नज़्म प्रसिद्ध शायर निज़ाम नौशाही की ऐसी ही एक इंक़लाबी रचना है, जो मज़लूमों को अपनी ताक़त पहचानने और अन्याय के विरुद्ध संगठित होकर खड़े होने का संदेश देती है।
इस नज़्म में शायर यह विश्वास व्यक्त करते हैं कि अत्याचार चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, यदि पीड़ित लोग अपनी ख़ामोशी तोड़ दें और अपने हक़ के लिए एकजुट हो जाएँ, तो सबसे बड़ी सत्ता भी बदल सकती है। नज़्म के अशआर प्रतिरोध, इंसाफ़, मोहब्बत और आत्मसम्मान के भावों को एक साथ समेटते हैं।
नज़्म
हैं तो मज़लूम मगर तेग़ उठा सकते हैं
ज़ुल्म और जब्र को मिट्टी में मिला सकते हैं
हाकिम-ए-वक़्त के पैरों में पड़े हैं बुज़दिल
किस तरह हक़ की ये आवाज़ उठा सकते हैं
आप के वास्ते क़ुर्बान तो हो जाऊँ मगर
आप इक लम्हे में एहसान भुला सकते हैं
अपने होंटों पे मोहब्बत का तबस्सुम रख कर
आप चाहें जिसे दीवाना बना सकते हैं
जितने भी गूँगे हैं वो बोलने लग जाएँ अगर
एक ज़ालिम को ये मसनद से उठा सकते हैं
बस यही बात कि वो पहली मोहब्बत है ‘निज़ाम’
वर्ना हम तो उसे औक़ात दिखा सकते हैं
नज़्म का संदेश
यह रचना बताती है कि इंसाफ़ की लड़ाई केवल तलवार से नहीं, बल्कि हिम्मत, एकता और सच बोलने के साहस से जीती जाती है। शायर का संदेश स्पष्ट है—जब मज़लूम अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं, तो ज़ुल्म की बुनियाद हिल जाती है। साथ ही, नज़्म का अंतिम हिस्सा इंसानी रिश्तों, मोहब्बत और आत्मसम्मान की गहराई को भी बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने लाता है।
आज के दौर में भी यह नज़्म सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक अधिकारों और इंसानी गरिमा की लड़ाई लड़ने वालों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।
शायर: निज़ाम नौशाही
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